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Chapter 1
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जिस चीज़ का नाम नहीं था
दुनिया थी, ख़्वाब थे,
पर दुनिया में आराम नहीं था।
कुछ तो था जो खल रहा था,
बस उसका कोई नाम नहीं था।
आँखें थीं, उलझन थी,
पर नींद का कोई निशान नहीं था।
मैं देर तलक दीवारों को देखा करता,
पर सवालों का अंजाम नहीं था।
सर्द रातें, बेचैनी,
और तन्हाई का मौसम था।
रोना मुझको आता नहीं था,
पर आँखों में एक समंदर था।
मैं उन लहरों को पीता रहता,
जिनका कोई किनारा नहीं था।
शायद किसी आवाज़ की कमी थी,
या किसी अपने के एहसास की।
मैं तब इतना भी नहीं जानता था,
कि शुरुआत होने वाली थी एक तलाश की।
कुछ तो था जो खल रहा था,
बस उसका कोई नाम नहीं था।
बारिश में रखी धूप
By @devwrites81
Published: July 11, 2026 at 9:22 AM
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